30 दिन जेल में रहे तो PM-CM की जाएगी कुर्सी : मानसून सत्र में फिर आ सकते हैं 3 बड़े बिल; JPC 17 जुलाई को दे सकती है रिपोर्ट
नई दिल्ली.
अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या राज्य मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होने के बाद लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपना पद छोड़ना पड़ सकता है।
केंद्र सरकार से जुड़े तीन अहम विधेयकों पर विचार कर रही संसद की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) जल्द अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है। माना जा रहा है कि सरकार इन विधेयकों को आगामी मानसून सत्र में दोबारा संसद में पेश कर सकती है।
सूत्रों के अनुसार, 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर बनी JPC 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को अंतिम मंजूरी दे सकती है। जानकारी यह भी है कि समिति इस प्रस्तावित प्रावधान को हटाने के पक्ष में नहीं है। यदि रिपोर्ट मंजूर होती है तो सरकार विधेयकों को संसद के दोनों सदनों में चर्चा और पारित कराने के लिए ला सकती है।
पिछले मानसून सत्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस विषय से जुड़े तीन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में पेश किए थे। बाद में इन्हें विस्तृत परीक्षण के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया था।

किन विधेयकों में प्रस्तावित है बदलाव
सरकार ने तीन अलग-अलग विधेयकों के जरिए यह व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव रखा है।
130वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025 (केंद्र और राज्यों के लिए)
गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज (संशोधन) विधेयक, 2025 (केंद्र शासित प्रदेशों के लिए)
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 (जम्मू-कश्मीर के लिए)
इनका उद्देश्य प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के पद पर बने रहने से जुड़े नियमों में बदलाव करना है।
क्या कहता है प्रस्तावित कानून
प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार यदि किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या राज्य मंत्री को ऐसे अपराध में गिरफ्तार किया जाता है, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है और वह लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो 31वें दिन उसे पद छोड़ना होगा।
हालांकि केवल गिरफ्तारी होने से पद नहीं जाएगा। यह व्यवस्था तभी लागू होगी जब व्यक्ति लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहे। यदि बाद में अदालत से जमानत मिल जाती है और अन्य कानूनी बाधाएं नहीं रहतीं, तो संबंधित व्यक्ति दोबारा पद संभाल सकता है।
सरकार का तर्क- जवाबदेही बढ़ेगी
सरकार का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर आरोपों के बावजूद लंबे समय तक जेल में रहकर मंत्री पद पर बने रहना उचित नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कानून में स्पष्ट प्रावधान आवश्यक हैं।
विपक्ष ने जताई आशंका
विपक्षी दलों का कहना है कि यदि ऐसा कानून लागू होता है तो केंद्रीय जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के जरिए राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार कर चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की जा सकती है। विपक्ष का मानना है कि ऐसे मामलों में राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
JPC जोड़ सकती है सुरक्षा प्रावधान
सूत्रों के मुताबिक संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट में ऐसे सुरक्षा उपाय शामिल कर सकती है, जिससे केवल राजनीतिक उद्देश्य से दर्ज मामलों के आधार पर किसी सरकार को अस्थिर करने की संभावना कम हो। समिति इस संतुलन पर भी विचार कर रही है कि जवाबदेही बनी रहे और कानून का दुरुपयोग भी न हो।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती संभव
पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस ए.के. पटनायक का मानना है कि यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है तो इसकी संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। ऐसे में अंतिम व्याख्या न्यायपालिका के हाथ में होगी।
2014 के बाद 13 मौजूदा मंत्रियों की हुई गिरफ्तारी
सरकारी और सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार 2014 के बाद केंद्रीय जांच एजेंसियां CBI और ED विभिन्न मामलों में 13 मौजूदा मंत्रियों को गिरफ्तार कर चुकी हैं। इनमें अधिकांश गिरफ्तारियां मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) के तहत हुईं। इनमें सबसे अधिक मामले दिल्ली और पश्चिम बंगाल से जुड़े रहे।
इन मामलों ने बढ़ाई बहस
दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मार्च 2024 में दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED ने गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद भी वह कई महीनों तक मुख्यमंत्री बने रहे और सितंबर 2024 में जमानत मिलने के बाद इस्तीफा दिया।
इसी तरह तमिलनाडु के मंत्री वी. सेंथिल बालाजी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तारी के बावजूद करीब आठ महीने तक मंत्री पद पर बने रहे। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने उन्हें विभाग रहित मंत्री के रूप में बनाए रखा था।
इन घटनाओं के बाद संवैधानिक पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की मांग और तेज हुई।
आगे क्या होगा
यदि 17 जुलाई को संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट मंजूर करती है, तो सरकार मानसून सत्र में इन तीनों विधेयकों को दोबारा संसद में पेश कर सकती है। दोनों सदनों से पारित होने और आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही यह प्रस्ताव कानून का रूप ले सकेगा।
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