सोमनाथ ज्योर्तिलिंग को लेकर नया विवाद : श्री श्री रविशंकर ने कहा- फिर स्थापित करेंगे, मेरे पास अंश; संतों-महंतों ने किया विरोध
Fri, May 30, 2025
सोमनाथ
(
गुजरात).
भारत
के
प्रथम
ज्योतिर्लिंग
सोमनाथ
मंदिर
को
लेकर
नया
धार्मिक
विवाद
खड़ा
हो
गया
है।
आर्ट
ऑफ
लिविंग
के
संस्थापक
श्री
श्री
रविशंकर
द्वारा
मंदिर
में
शिवलिंग
के
टुकड़े
पुनः
प्रतिष्ठित
करने
के
दावे
के
बाद
संत
समाज
में
तीखी
प्रतिक्रिया
देखने
को
मिल
रही
है।
शंकराचार्यों
,
संतों
,
और
धार्मिक
संस्थाओं
ने
इसे
आस्था
और
परंपरा
के
खिलाफ
बताया
है।
श्री
श्री
रविशंकर
का
कहना
है
कि
महाकुंभ
2025
के
दौरान
उन्हें
सोमनाथ
शिवलिंग
के
चार
खंडित
टुकड़े
प्राप्त
हुए
,
जिन्हें
उन्होंने
ऐतिहासिक
बताया।
उन्होंने
कहा
कि
ये
टुकड़े
महमूद
गजनवी
द्वारा
1026
ई
.
में
तोड़े
गए
मूल
शिवलिंग
के
हैं।
रविशंकर
ने
ऐलान
किया
कि
इनमें
से
दो
हिस्सों
को
सोमनाथ
मंदिर
में
पुनः
स्थापित
किया
जाएगा।
शंकराचार्यों
का
विरोध
: "
ज्योतिर्लिंग
स्वयंभू
होता
है
,
इसे
दोबारा
स्थापित
नहीं
किया
जा
सकता
"
ज्योतिष
पीठ
के
शंकराचार्य
स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद
सरस्वती
ने
कहा
- "
अगर
आज
तक
रविशंकर
जी
ने
इस
मुद्दे
पर
बात
नहीं
की
,
तो
अब
अचानक
ऐसा
दावा
क्यों
?
यदि
कोई
नया
शिवलिंग
स्थापित
होगा
,
तो
वर्तमान
शिवलिंग
की
पूजा
अधूरी
मानी
जाएगी
—
यह
आस्था
का
विभाजन
है।
"
द्वारका
शारदापीठ
के
शंकराचार्य
स्वामी
सदानंद
सरस्वती
ने
स्पष्ट
किया
- “
सोमनाथ
एक
स्वयंभू
ज्योतिर्लिंग
है।
इसे
दोबारा
स्थापित
करने
की
आवश्यकता
नहीं
है।
प्राचीन
मूर्तियों
की
प्राण
प्रतिष्ठा
एक
बार
ही
होती
है।
”
संतों
और
महंतों
की
राय
: "
ज्वाला
का
खंडन
नहीं
होता
"
महंत
हरिगिरि
महाराज
ने
कहा
- "
ज्योतिर्लिंग
अग्नि
स्वरूप
है।
अग्नि
या
ज्वाला
का
कभी
खंडन
नहीं
होता।
यह
शक्ति
देवताओं
और
दानवों
के
भी
परे
है।
"
शिव
उपासक
निजानंद
स्वामी
ने
कहा-
“1000
साल
पुराने
शिवलिंग
के
टुकड़े
किसी
के
पास
होना
असंभव
है।
वर्तमान
शिवलिंग
ही
पूजा
का
केंद्र
है।
नया
जोड़ना
भ्रम
फैलाएगा।
”
ट्रस्ट
और
पुजारियों
की
प्रतिक्रिया
: "
प्रमाण
नहीं
,
न
ही
औपचारिक
संपर्क
"
सोमनाथ
ट्रस्ट
के
ट्रस्टी
पीके
लाहिड़ी
ने
कहा
- “
हमारे
पास
ऐसा
कोई
दस्तावेज़
या
प्रमाण
नहीं
है
कि
श्री
श्री
रविशंकर
के
पास
जो
टुकड़े
हैं
,
वे
मूल
शिवलिंग
के
हैं।
न
ही
उन्होंने
ट्रस्ट
से
कोई
आधिकारिक
पत्राचार
किया
है।
”
घेला
सोमनाथ
मंदिर
के
पुजारी
हसमुखभाई
जोशी
ने
कहा
- “
शिवलिंग
की
एक
बार
प्राण
प्रतिष्ठा
हो
जाए
,
तो
उसे
दोबारा
प्रतिष्ठित
नहीं
किया
जा
सकता।
यह
शास्त्रों
के
विरुद्ध
है।
”
श्री
श्री
रविशंकर
का
दावा
: "
ब्राह्मणों
ने
शिवलिंग
के
टुकड़े
सुरक्षित
रखे
"
रविशंकर
ने
बताया
कि
गजनवी
द्वारा
तोड़े
गए
शिवलिंग
के
हिस्से
तमिलनाडु
ले
जाए
गए
थे
,
जहां
अग्निहोत्री
ब्राह्मणों
ने
उन्हें
सुरक्षित
रखा।
1924
में
इन्हें
कांचीपुरम
के
तत्कालीन
शंकराचार्य
को
सौंपा
गया
,
जिन्होंने
इन्हें
छिपाकर
रखने
को
कहा
और
राम
मंदिर
निर्माण
के
बाद
उजागर
करने
की
अनुमति
दी।
धार्मिक
विशेषज्ञों
की
राय
: “
यह
विवाद
शास्त्र
सम्मत
नहीं
”
शिव
कथावाचक
गिरिबापू
ने
कहा
- “
ज्योतिर्लिंग
का
अर्थ
है
प्रकाश
का
अंतहीन
स्रोत।
यह
ब्रह्मा
और
विष्णु
के
मिलन
से
उत्पन्न
हुआ।
शिवलिंग
के
आगे
‘
ज्योति
’
शब्द
इसलिए
लगाया
जाता
है।
इसकी
पुनः
प्रतिष्ठा
की
बात
शास्त्रों
में
नहीं
है।
”
भारत का प्रथम ज्योतिर्लिंग और आस्था का अद्वितीय प्रतीक
सोमनाथ मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है, गिर-सोमनाथ ज़िले के प्रभास पाटन नामक स्थान पर।
यह बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग है, जिसे भगवान शिव का सबसे पवित्र स्वरूप माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ चंद्रदेव (चंद्रमा) ने भगवान शिव की तपस्या करके अपने श्राप से मुक्ति पाई थी।
इसलिए शिव को यहाँ "सोमनाथ" यानी
"सोम (चंद्र) के स्वामी"
कहा गया।
इतिहास और विनाश-पुनर्निर्माण
सोमनाथ मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों में से एक है, जिसका इतिहास लगभग 2000 वर्षों से भी अधिक पुराना है।
यह मंदिर कई बार तोड़ा गया और फिर से बनाया गया
पहली बार महमूद गजनवी ने 1026 ई. में हमला कर शिवलिंग को खंडित किया।
दूसरा पुनर्निर्माण चालुक्य राजा भीमदेव द्वारा किया गया।
अगले कुछ सौ वर्षों में मंदिर को कई मुस्लिम शासकों ने बार-बार नष्ट किया, जिनमें दिल्ली सल्तनत और मुगल शासन शामिल थे।
आखिरी पुनर्निर्माण भारत की स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से 1951 में हुआ।
आधुनिक मंदिर का स्वरूप
वर्तमान मंदिर चालुक्य शैली में बना हुआ है।
इसे पिंक सैंडस्टोन (गुलाबी बलुआ पत्थर) से बनाया गया है।
मंदिर की दीवारों पर शिव पुराण और हिंदू शास्त्रों की कथाएं उकेरी गई हैं।
समुद्र से जुड़ा चमत्कार
मंदिर अरब सागर के किनारे स्थित है और इसका दक्षिणी दरवाज़ा ऐसा बनाया गया है कि वहां से देखने पर समुद्र के उस पार कोई भी भूखंड नहीं दिखता — इसे "अरब सागर में अंतहीन दृष्टि रेखा (Abadhit Samudra Darshan)" कहते हैं।