'भाजपा सरकार मुर्दाबाद' कहना अपराध नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस को लगाई फटकार; कहा- विरोध करना नागरिकों का अधिकार
मुंबई.
मुंबई में विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी को लेकर दर्ज एक मामले की सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को मुंबई पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने साफ कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना और सरकार के खिलाफ नारे लगाना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। केवल "भाजपा सरकार मुर्दाबाद" जैसे नारे लगाने के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ तड़ीपार (एक्सटर्नमेंट) जैसी कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।
मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस माधव जामदार ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा हो। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर लोग अपनी बात रखने या किसी मुद्दे पर विरोध दर्ज कराने निकलेंगे और उन पर मुकदमे दर्ज कर दिए जाएंगे, तो लोकतांत्रिक अधिकारों का क्या अर्थ रह जाएगा।
तड़ीपार आदेश पर उठाए सवाल
यह मामला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी से जुड़ा है। मुंबई पुलिस ने उनके खिलाफ तड़ीपार का आदेश जारी किया था। आरोप था कि वे नागरिकता संशोधन कानून (CAA), ज्ञानवापी विवाद समेत केंद्र सरकार के विभिन्न फैसलों के खिलाफ लगातार धरना-प्रदर्शन और मोर्चे आयोजित कर रहे थे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि यदि किसी व्यक्ति ने केवल सरकार विरोधी नारे लगाए हैं तो उसके खिलाफ इतनी कठोर कार्रवाई क्यों की गई।
'विरोध लोकतंत्र की आत्मा है'
जस्टिस जामदार ने कहा कि नागरिकों को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। उन्होंने टिप्पणी की कि देश में कई पेपर लीक जैसी घटनाएं हुई हैं। यदि लोग इन मुद्दों पर भी विरोध नहीं कर सकते और हर विरोध पर केस दर्ज होगा, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरकार के खिलाफ नारे लगाना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता।
हॉर्स ट्रेडिंग पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि राज्य में इन दिनों लगातार दल-बदल और हॉर्स ट्रेडिंग की चर्चा हो रही है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि राजनीतिक दल बदलने से सारे पुराने मामले "धुल" जाते हैं, तो इसे किसी वॉशिंग मशीन से कम नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में एक बच्चे की सड़क दुर्घटना में मौत जैसे गंभीर मुद्दों की बजाय विधानसभा में राजनीतिक घटनाक्रमों पर अधिक चर्चा हो रही है, जो चिंताजनक है।
'पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं'
अदालत ने पुलिस की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की। जस्टिस जामदार ने कहा कि पुलिस किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की निजी कर्मचारी नहीं है, बल्कि वह जनता की सेवक है। उन्होंने संकेत दिए कि यदि कार्रवाई मनमानी पाई गई तो संबंधित अधिकारियों पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
मामले पर आगे होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए मामले की आगे भी सुनवाई जारी रखने का फैसला किया है। अदालत की इन टिप्पणियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
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