ग्रामीणों ने ‘चुराया’ बस्तर राजा का 55 पहियों वाला विजय रथ : नवाखाई की शर्त पूरी की फिर लौटाया; 618 साल पुरानी परंपरा देखने फ्रांस-डेनमार्क से पहुंचे पर्यटक
News Affair Team
Fri, Oct 23, 2026
जगदलपुर.
बस्तर दशहरे में राजा और प्रजा के रिश्ते की एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें ग्रामीण पहले राजा का विजय रथ अपने कब्जे में ले लेते हैं और फिर राजा को मनाने के लिए गांव आना पड़ता है। गुरुवार को बाहर रैनी की रस्म में यही अनूठा दृश्य देखने को मिला। बस्तर की इस सदियों पुरानी परंपरा को देखने फ्रांस और डेनमार्क से आए पर्यटक भी मौजूद रहे।
कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपाकर रखा गया आठ पहियों वाला विजय रथ तब लौटाया गया, जब राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने ग्रामीणों के साथ नए चावल और देसी गाय के दूध से बनी खीर खाकर नवाखाई की रस्म पूरी की। इसके बाद सैकड़ों ग्रामीण रस्सियों से रथ खींचते हुए राजमहल पहुंचे। आतिशबाजी और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच हुई इस रस्म को देखने हजारों लोग जुटे।

पहले रथ ले गए ग्रामीण, फिर राजा को बुलाया गांव
बस्तर दशहरे की बाहर रैनी परंपरा में ग्रामीणों और राज परिवार के बीच प्रतीकात्मक रूठने-मनाने का सिलसिला निभाया जाता है। बुधवार देर रात ग्रामीण राजमहल के सामने से विजय रथ अपने कब्जे में लेकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा आए थे।
परंपरा के अनुसार, रथ वापस पाने के लिए राज परिवार के सदस्य को ग्रामीणों की शर्त माननी होती है। इसके तहत राजा को पूरे राजसी ठाठ-बाट के साथ गांव बुलाया जाता है और उनके साथ नवाखाई की रस्म निभाई जाती है। इस बार भी कमलचंद्र भंजदेव घोड़े वाले रथ के साथ कुम्हड़ाकोट पहुंचे।

नए चावल और देसी गाय के दूध की खीर खाई
ग्रामीणों ने नवाखाई के लिए बस्तर रियासत की जमीन पर उपजे नए चावल और देसी गाय के दूध से खीर तैयार की थी। कमलचंद्र भंजदेव ने ग्रामीणों के साथ बैठकर खीर खाई। इसके बाद पूजा-पाठ और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच देवी-देवताओं को भोग अर्पित किया गया।
राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव के मुताबिक, ग्रामीणों ने उन्हें प्रतीकात्मक सजा के तौर पर पूरे शाही ठाठ-बाट के साथ गांव आने और उनके साथ नवाखाई खाने को कहा था। रस्म पूरी होने के बाद ही विजय रथ लौटाया जाता है। इस परंपरा में बस्तर के देवी-देवताओं की भी भागीदारी रहती है।

55 गांवों के माड़िया समुदाय की अहम भूमिका
करीब 618 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में किलेपाल, बास्तानार समेत 55 गांवों के माड़िया समुदाय के ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यही ग्रामीण आठ पहियों वाले दो मंजिला विजय रथ को राजमहल के सामने से ले जाकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपाते हैं।
नवाखाई की रस्म पूरी होने के बाद ग्रामीण रस्सियों के सहारे रथ खींचते हुए राजमहल तक लाए। परंपरा के मुताबिक, कमलचंद्र भंजदेव रथ के आगे चले और ग्रामीण पीछे से उसे खींचते रहे।

आतिशबाजी के बीच लौटा विजय रथ
जंगल से राजमहल तक विजय रथ की वापसी के दौरान उत्सव जैसा माहौल रहा। आतिशबाजी के बीच राज परिवार और रथ का स्वागत किया गया। सैकड़ों ग्रामीणों ने मिलकर विशाल रथ को खींचा। इस दौरान क्षेत्र के अलग-अलग देवी-देवताओं के देव विग्रह भी परंपरा में शामिल हुए।
रथ की ऊंचाई को देखते हुए शहर में प्रवेश के दौरान कुछ समय के लिए बिजली आपूर्ति बंद रखी गई, ताकि वह हाईटेंशन तारों के संपर्क में न आए। सुरक्षा के इस इंतजाम के बीच विजय रथ की वापसी की रस्म पूरी हुई।
बस्तर की परंपरा देखने विदेशों से पहुंचे पर्यटक
बस्तर दशहरा अपनी अनूठी रस्मों और सामुदायिक भागीदारी के लिए जाना जाता है। बाहर रैनी की परंपरा देखने गुरुवार को फ्रांस और डेनमार्क से भी पर्यटक पहुंचे। उनके लिए विजय रथ की वापसी, नए चावल से बनी खीर की रस्म और ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी खास आकर्षण रही।
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