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10th June 2026

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अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन 2030 तक खत्म हो जाएगा : प्रशांत महासागर में गिराएगा NASA; 25 साल बाद होगा रिटायर, ₹9500 करोड़ खर्च होंगे

News Affair Team

Wed, Jun 10, 2026

पृथ्वी की कक्षा में पिछले ढाई दशक से विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान का केंद्र रहा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने इसकी विदाई की विस्तृत योजना सार्वजनिक करते हुए बताया है कि 2030 तक स्टेशन को नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कराया जाएगा, जहां इसका अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो जाएगा

वॉशिंगटन.

अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। करीब 25 वर्षों से पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) को अब चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटाने की तैयारी शुरू हो गई है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने इसके लिए लगभग एक अरब डॉलर की योजना तैयार की है, जिसके तहत वर्ष 2030 तक स्टेशन को सुरक्षित रूप से पृथ्वी के वायुमंडल में उतारा जाएगा।

करीब 4.5 लाख किलोग्राम वजनी ISS वर्ष 1998 में अंतरिक्ष में स्थापित किया गया था। नवंबर 2000 से इस पर लगातार अंतरिक्ष यात्रियों की मौजूदगी बनी हुई है। इसे अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा के सहयोग से विकसित किया गया था और यह दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला के रूप में जाना जाता है।

बढ़ती तकनीकी चुनौतियों के बीच लिया गया फैसला

विशेषज्ञों के अनुसार ISS अपनी निर्धारित आयु से अधिक समय तक सेवा दे चुका है। पिछले कुछ वर्षों में स्टेशन में तकनीकी समस्याओं और रखरखाव की लागत लगातार बढ़ी है। इसे सुरक्षित बनाए रखने पर हर साल अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं।

NASA अब अपने संसाधनों और बजट को चंद्रमा तथा मंगल मिशनों जैसे भविष्य के अभियानों पर केंद्रित करना चाहता है। इसी रणनीति के तहत ISS को सम्मानजनक और सुरक्षित तरीके से रिटायर करने का निर्णय लिया गया है।

विशेष यान करेगा अंतिम मिशन

NASA के मुताबिक स्टेशन को सीधे धरती पर गिरने के लिए नहीं छोड़ा जाएगा। 2028 के बाद इसकी कक्षा बनाए रखने की प्रक्रिया धीरे-धीरे समाप्त की जाएगी। इसके बाद एक विशेष अंतरिक्ष यान ISS को नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल की ओर धकेलेगा।

वायुमंडल में प्रवेश के दौरान घर्षण के कारण स्टेशन का अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो जाएगा। हालांकि कुछ बड़े हिस्से बच सकते हैं, इसलिए उनके गिरने के लिए पृथ्वी पर एक सुरक्षित क्षेत्र पहले से तय किया गया है।

पॉइंट नीमो में गिरेगा मलबा

ISS के अवशेषों को दक्षिण प्रशांत महासागर के उस निर्जन क्षेत्र में गिराने की योजना है जिसे "पॉइंट नीमो" कहा जाता है। यह पृथ्वी पर समुद्र का सबसे अलग-थलग और दूरस्थ स्थान माना जाता है।

इस क्षेत्र के आसपास कोई स्थायी आबादी नहीं है और न ही नियमित समुद्री यातायात होता है। यही वजह है कि पिछले कई दशकों से पुराने उपग्रहों, अंतरिक्ष यानों और अन्य स्पेस डेब्रिस को यहीं नियंत्रित तरीके से गिराया जाता रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार 1970 के दशक से अब तक सैकड़ों अंतरिक्षीय अवशेष इस क्षेत्र में भेजे जा चुके हैं। वर्ष 2001 में रूस के प्रसिद्ध मीर स्पेस स्टेशन का मलबा भी इसी क्षेत्र में गिराया गया था।

क्या है पॉइंट नीमो?

दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित पॉइंट नीमो को "ओशनिक पोल ऑफ इनएक्सेसिबिलिटी" भी कहा जाता है। यह समुद्र का वह बिंदु है जो आसपास के किसी भी भूभाग से हजारों किलोमीटर दूर स्थित है।

"नीमो" शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है "कोई नहीं"। यह नाम फ्रांसीसी लेखक जूल्स वर्न के प्रसिद्ध काल्पनिक पात्र कैप्टन नीमो से भी प्रेरित माना जाता है।

निजी अंतरिक्ष स्टेशनों का दौर शुरू

ISS की विदाई के साथ अंतरिक्ष अनुसंधान का नया युग भी शुरू हो रहा है। NASA अब निजी कंपनियों के साथ मिलकर अगली पीढ़ी के अंतरिक्ष स्टेशनों के विकास पर काम कर रहा है।

अमेरिका की कई निजी कंपनियां अपने स्वतंत्र स्पेस स्टेशन विकसित कर रही हैं। वहीं चीन पहले ही अपना अंतरिक्ष स्टेशन संचालित कर रहा है। भारत भी 2035 तक अपना स्वदेशी अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है।

अंतरिक्ष विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल ISS

ISS पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करता है और करीब 27,600 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से यात्रा करता है। यह प्रतिदिन लगभग 16 बार पृथ्वी का चक्कर लगाता है।

पिछले 25 वर्षों में स्टेशन पर हजारों वैज्ञानिक प्रयोग किए गए, जिन्होंने मानव स्वास्थ्य, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जीव विज्ञान और पृथ्वी विज्ञान से जुड़े अनुसंधानों को नई दिशा दी। अंतरिक्ष विशेषज्ञों का मानना है कि ISS की विरासत आने वाले दशकों तक मानव अंतरिक्ष कार्यक्रमों का मार्गदर्शन करती रहेगी।

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