PM मोदी @ 4399 : नेहरू का रिकॉर्ड पीछे छूटा; भारतीय राजनीति में 12 वर्षों की सबसे बड़ी कहानी
नईदिल्ली | विशेष विश्लेषण.
भारतीय लोकतंत्र में कुछ घटनाएं केवल राजनीतिक उपलब्धियां नहीं होतीं, वे इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में देश में सबसे लंबा कार्यकाल पूरा करना ऐसी ही एक घटना है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले यह रिकॉर्ड स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम था।
जब नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि एक दशक बाद वे भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाएंगे और लगातार जनादेश हासिल करते हुए नेहरू के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ देंगे। लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है और जनता का विश्वास उसके सबसे बड़े निर्णायकों में से एक।
यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं है। यह उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है जिसने पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों, शासन व्यवस्था और मतदाताओं की सोच को नई दिशा दी।

जब भारत ने बदलाव के लिए वोट किया
2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ था। दस वर्षों तक सत्ता में रही यूपीए सरकार भ्रष्टाचार, महंगाई और नीतिगत सुस्ती के आरोपों से घिरी हुई थी। देश में बदलाव की मांग तेज थी।
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहचान बना चुके नरेंद्र मोदी ने खुद को विकास और निर्णायक नेतृत्व के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया। चुनावी सभाओं में उनकी भाषा सीधी थी और संदेश स्पष्ट, "मजबूत सरकार, तेज विकास और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन"।
परिणाम अभूतपूर्व रहे। भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिला। स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। यहीं से भारतीय राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।
नेहरू और मोदी: दो युग, दो अलग परिस्थितियां
नरेंद्र मोदी और जवाहरलाल नेहरू की तुलना अक्सर राजनीतिक बहस का विषय बनती है। लेकिन दोनों नेताओं ने अलग-अलग भारत का नेतृत्व किया।
नेहरू ने उस भारत की कमान संभाली थी जो विभाजन के घावों से उबर रहा था। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण होना था। संविधान लागू हो चुका था, लेकिन लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होना बाकी थीं।
दूसरी ओर मोदी ने ऐसे भारत का नेतृत्व संभाला जो दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दौड़ में था। चुनौतियां अलग थीं, रोजगार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी बदलाव, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विस्तार।
इसलिए दोनों की तुलना केवल कार्यकाल की अवधि से नहीं की जा सकती। दोनों अपने-अपने समय की जरूरतों और चुनौतियों के प्रतीक रहे हैं।
मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा आधार: सीधा संवाद
भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी ताकत उनका सीधा संवाद माना जाता है।
रेडियो कार्यक्रम, सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, जनसभाएं और चुनावी अभियान, हर मंच पर उन्होंने सीधे मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी ने पारंपरिक राजनीतिक संचार के तरीके बदल दिए। जहां पहले संदेश पार्टी संगठन के माध्यम से जनता तक पहुंचता था, वहीं मोदी के दौर में नेता सीधे मतदाता से संवाद करने लगा।
यही कारण है कि उनका समर्थन केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़ी संख्या में पहली बार वोट देने वाले युवाओं तक भी पहुंचा।

12 वर्षों में विकास की राजनीति
मोदी सरकार के समर्थक पिछले 12 वर्षों को बुनियादी ढांचे और डिजिटल परिवर्तन का दौर बताते हैं।
देश में एक्सप्रेसवे नेटवर्क का विस्तार हुआ। रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया। हवाई अड्डों की संख्या बढ़ी। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क और बिजली पहुंचाने के प्रयास तेज हुए।
डिजिटल इंडिया अभियान ने सरकारी सेवाओं की पहुंच को बदल दिया। यूपीआई ने भुगतान व्यवस्था को नया स्वरूप दिया। आज छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक डिजिटल लेनदेन का उपयोग कर रहे हैं।
जनधन योजना, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना और पीएम आवास जैसी योजनाओं को सरकार अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनाती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा का विमर्श
मोदी सरकार के कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा राजनीति का केंद्रीय विषय बनकर उभरी।
उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक ने राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया।
सरकार ने इन कदमों को आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई बताया, जबकि विपक्ष ने इन मुद्दों पर अलग-अलग सवाल भी उठाए। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा मोदी की राजनीतिक छवि का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
अनुच्छेद 370 से राम मंदिर तक
मोदी सरकार के कार्यकाल में कई ऐसे फैसले हुए जिनकी चर्चा दशकों से होती रही थी।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, नागरिकता संशोधन कानून, तीन तलाक कानून और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों ने राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को व्यापक रूप से प्रभावित किया।
समर्थकों ने इन्हें ऐतिहासिक फैसले बताया, जबकि विरोधियों ने संवैधानिक और सामाजिक प्रभावों पर प्रश्न उठाए।
वैश्विक मंच पर भारत की नई पहचान
पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति भी चर्चा का विषय रही। अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और खाड़ी देशों के साथ संबंधों को नई दिशा देने का प्रयास किया गया। जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी ने भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत किया।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को एक उभरती शक्ति के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। विदेश नीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि मोदी सरकार ने वैश्विक कूटनीति को घरेलू राजनीति के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ा।
आलोचनाएं और चुनौतियां भी साथ रहीं
किसी भी लंबे कार्यकाल की तरह मोदी सरकार भी आलोचनाओं से अछूती नहीं रही।
बेरोजगारी, महंगाई, कृषि क्षेत्र की चुनौतियां और आय असमानता जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा।
नोटबंदी और कुछ आर्थिक फैसलों पर भी तीखी बहस हुई। कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार की नीतियों को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आईं।
हालांकि समर्थकों का तर्क है कि संकट के समय भी सरकार ने बड़े पैमाने पर राहत और टीकाकरण अभियान चलाकर स्थिति को संभाला।

2024: तीसरा जनादेश क्यों महत्वपूर्ण था
2024 का लोकसभा चुनाव मोदी के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा था।
दो बार सत्ता में रहने के बाद आमतौर पर सरकारों के खिलाफ माहौल बनने लगता है। लेकिन भाजपा तीसरी बार सत्ता में लौटने में सफल रही।
हालांकि सीटों की संख्या पहले की तुलना में कम रही, फिर भी मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। इस जीत ने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय राजनीति में उनका प्रभाव अभी भी कायम है।
नेहरू का रिकॉर्ड टूटने का राजनीतिक अर्थ
नेहरू का रिकॉर्ड टूटना केवल दिनों की संख्या का मामला नहीं है। यह बताता है कि भारतीय मतदाता लंबे समय तक किसी एक नेतृत्व पर भरोसा भी जता सकता है, यदि उसे लगता है कि सरकार उसकी अपेक्षाओं को पूरा कर रही है।
यह उपलब्धि यह भी दिखाती है कि भारत की राजनीति गठबंधन युग से आगे बढ़कर मजबूत नेतृत्व केंद्रित राजनीति की ओर बढ़ी है।
इतिहास में मोदी की जगह कहां होगी?
यह सवाल अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है। इतिहास तत्काल निर्णय नहीं देता। नेहरू को आधुनिक भारत की संस्थाओं का निर्माता कहा जाता है। इंदिरा गांधी को निर्णायक नेतृत्व और कठिन फैसलों के लिए याद किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी को उदार राष्ट्रवाद और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए जाना जाता है।
मोदी का मूल्यांकन आने वाली पीढ़ियां इस आधार पर करेंगी कि उनके नेतृत्व में भारत ने आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक स्तर पर कितना स्थायी परिवर्तन हासिल किया।
एक रिकॉर्ड से आगे की कहानी
रिकॉर्ड बनते हैं और टूटते भी हैं। लेकिन कुछ रिकॉर्ड अपने पीछे एक युग की कहानी छोड़ जाते हैं।
नरेंद्र मोदी का सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह भारतीय राजनीति में नेतृत्व, जनसंपर्क, चुनावी रणनीति और शासन शैली में आए बदलावों का प्रतीक भी है।
इतिहास की किताबों में जब 21वीं सदी के भारत का अध्याय लिखा जाएगा, तो उसमें नरेंद्र मोदी का नाम केवल एक प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि उस नेता के रूप में दर्ज होगा जिसने लगातार तीन आम चुनाव जीतकर भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी और स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लंबे समय से कायम रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।
यह उपलब्धि राजनीतिक बहसों से परे एक ऐतिहासिक तथ्य है, और इतिहास ऐसे तथ्यों को लंबे समय तक याद रखता है।
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