TMC के बागियों में शत्रुघ्न सिन्हा-पठान और सयानी घोष भी! : 20 सांसद और 58 विधायक अलग गुट में; ममता बनर्जी की सियासत पर संकट के बादल
News Affair Team
Wed, Jun 10, 2026
कोलकाता.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर मचे घमासान ने नया मोड़ ले लिया है। पार्टी में बड़े पैमाने पर टूट की खबरों के बीच बागी खेमे ने दावा किया है कि लोकसभा के 20 सांसद और विधानसभा के 58 विधायक अब अलग गुट के साथ खड़े हैं। यदि यह दावा पूरी तरह सही साबित होता है, तो यह 28 वर्ष पुरानी तृणमूल कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट माना जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं। बागी खेमे का दावा है कि पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रहा असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है, जबकि टीएमसी नेतृत्व इन दावों को खारिज करने में जुटा हुआ है।

20 सांसदों के समर्थन का दावा, कई बड़े नाम शामिल
बागी गुट की अगुआई कर रहीं काकोली घोष ने दावा किया है कि उनके पास 20 लोकसभा सांसदों का समर्थन है। बताया गया है कि इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भी भेजा गया है, जिसमें अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में मान्यता और अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की गई है।
बागी खेमे की सूची में कई चर्चित नाम शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें जादवपुर से सांसद सायोनी घोष, बहरामपुर से सांसद यूसुफ पठान, आसनसोल से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, अभिनेता-राजनेता दीपक अधिकारी (देव), अभिनेत्री रचना बनर्जी और शताब्दी रॉय जैसे चेहरे भी शामिल हैं।
हालांकि टीएमसी की ओर से इन दावों पर सवाल उठाए गए हैं। पार्टी प्रवक्ता मानव जायसवाल ने कहा है कि सायोनी घोष और शत्रुघ्न सिन्हा अभी भी ममता बनर्जी के साथ हैं।
राज्यसभा में भी झटके, दो सांसदों ने छोड़ी पार्टी
लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी टीएमसी को झटके लगने की खबर है। पार्टी की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी तथा अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले सुखेंदु शेखर ने भी राज्यसभा सदस्यता और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया था।
इन इस्तीफों ने यह संकेत दिया है कि असंतोष केवल विधानसभा या लोकसभा तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के विभिन्न स्तरों पर असर दिखाई दे रहा है।
विधानसभा में नई शक्ति संतुलन की कोशिश
राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा विधानसभा में हुई कथित बगावत की है। दावा किया गया है कि टीएमसी के 58 विधायक अलग गुट बनाकर सामने आए हैं और उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना है।
बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र देकर ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष घोषित करने की मांग की। बाद में बागी खेमे ने दावा किया कि उनकी संख्या बढ़कर 64 तक पहुंच चुकी है और कुछ अन्य विधायक भी जल्द समर्थन पत्र सौंप सकते हैं।
यदि यह स्थिति आगे बढ़ती है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

दिल्ली में सक्रिय हुए ममता और अभिषेक
पार्टी के भीतर उभरे संकट के बीच ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी लगातार राजनीतिक संपर्क साधने में जुटे दिखाई दिए।
ममता बनर्जी ने दिल्ली में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की। वहीं अभिषेक बनर्जी ने राहुल गांधी से बातचीत की। इन बैठकों को विपक्षी एकता और टीएमसी के भीतर पैदा हुए संकट से जोड़कर देखा जा रहा है।
दूसरी ओर राज्यसभा से इस्तीफा देने वाली सुष्मिता देव की असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मुलाकात ने भी राजनीतिक अटकलों को हवा दी है।
फूट की जड़ में क्या है असंतोष?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी में मौजूदा संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं।
सबसे बड़ा कारण हालिया चुनावी प्रदर्शन को माना जा रहा है। चुनावी नतीजों के बाद संगठन की रणनीति और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे थे। पार्टी के भीतर एक वर्ग लगातार यह महसूस कर रहा था कि निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ नेताओं तक सीमित हो गई है।
अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर भी पार्टी के भीतर अलग-अलग राय सामने आती रही है। बागी खेमा खुलकर उनके नेतृत्व और संगठनात्मक शैली पर सवाल उठा रहा है।
इसके अलावा नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर विवाद और कथित हस्ताक्षर विवाद ने भी आंतरिक संघर्ष को और तेज कर दिया।
ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती
ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बड़े संघर्ष देखे हैं। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी बनाई, वाम मोर्चे के लंबे शासन को समाप्त किया और भाजपा की चुनौती का भी मुकाबला किया।
लेकिन मौजूदा संकट अलग तरह का है। इस बार चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर से उठती दिखाई दे रही है।
यदि सांसदों और विधायकों की बड़ी संख्या वास्तव में अलग खेमे के साथ चली जाती है, तो यह केवल संख्या का नुकसान नहीं होगा, बल्कि संगठनात्मक और राजनीतिक प्रभाव पर भी गहरा असर डाल सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
टीएमसी में चल रहा यह संघर्ष अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर दिखाई दे सकता है।
दल-बदल कानून की व्याख्या, विधानसभा और संसद में मान्यता का सवाल, चुनाव आयोग की भूमिका और संगठन पर नियंत्रण को लेकर आने वाले दिनों में नई लड़ाइयां देखने को मिल सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले सप्ताह तय करेंगे कि यह असंतोष बातचीत के जरिए खत्म होगा या फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए राजनीतिक धड़े का उदय होगा।
सबसे बड़ा सवाल: टीएमसी किसकी?
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस की असली राजनीतिक विरासत किसके पास रहेगी।
क्या ममता बनर्जी संगठन को फिर से एकजुट करने में सफल होंगी? क्या बागी खेमे का दावा वास्तविक ताकत में बदल पाएगा? या फिर यह संघर्ष अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंचेगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे, लेकिन इतना तय है कि टीएमसी के भीतर शुरू हुआ यह राजनीतिक भूचाल बंगाल की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।
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