राज्यसभा चुनाव के लिए यूपी में BJP ने 8 नए चेहरे उतारे : दो केंद्रीय मंत्रियों हरदीप पुरी-बीएल वर्मा का टिकट कटा; 2027 से पहले जातीय समीकरण साधे
News Affair Team
Mon, Oct 5, 2026
लखनऊ.
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले भाजपा ने सोमवार को बड़ा सियासी दांव चला है। पार्टी ने सभी 8 सीटों पर नए चेहरे उतारे हैं। इनमें धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार शामिल हैं।
इस सूची के साथ ही मौजूदा सांसदों में शामिल केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को दोबारा राज्यसभा भेजने का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है। भाजपा के बाकी मौजूदा सदस्यों अरुण सिंह, नीरज शेखर, सीमा द्विवेदी, बृजलाल और गीता शाक्य को भी टिकट नहीं मिला।
राज्यसभा चुनाव 16 अक्टूबर को होना है और नामांकन की आखिरी तारीख 6 अक्टूबर है। यूपी की 10 सीटों में से मौजूदा समय में 8 भाजपा, एक सपा और एक बसपा के पास है। दिनेश शर्मा के इस्तीफे के बाद एक सीट पहले ही खाली हो चुकी थी।

8 नामों में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन
भाजपा की सूची में 3 ओबीसी, 2 दलित और 3 सामान्य वर्ग के चेहरे हैं। इनमें दो महिलाएं प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार हैं। पार्टी ने संगठन में सक्रिय नेताओं के साथ क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व को भी जगह दी है।
धर्मपाल सिंह योगी सरकार में मंत्री और आंवला से विधायक हैं। वे लोधी समाज से आते हैं। प्रकाश पाल भाजपा पिछड़ा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। श्रुति गंगवार पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की बेटी हैं।
वहीं, प्रियंका सिंह रावत बाराबंकी से पूर्व सांसद हैं। राधाकांत ओझा इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। विद्यासागर सोनकर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद हैं। राम प्रताप सिंह चौहान भाजपा के प्रदेश महामंत्री हैं।
ब्राह्मण, ओबीसी और दलित समीकरण पर फोकस
भाजपा की सूची को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी के सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी ने ओबीसी वर्ग से जुड़े तीन चेहरों को जगह दी है, जबकि दलित वर्ग से भी दो उम्मीदवार उतारे हैं।
सामान्य वर्ग से राधाकांत ओझा, गोपी कृष्ण पांडेय और राम प्रताप सिंह चौहान को जगह मिली है। यानी भाजपा ने संगठनात्मक प्रतिनिधित्व के साथ सामाजिक समीकरण का भी संतुलन साधने की कोशिश की है।
हालांकि, उम्मीदवारों को केवल जातीय गणित से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी ने राज्य संगठन में सक्रिय नेताओं और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पकड़ रखने वाले चेहरों को भी मौका दिया है।

हरदीप पुरी और बीएल वर्मा के लिए क्या?
भाजपा की सूची में सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को टिकट नहीं मिलना है। दोनों का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है। भाजपा ने इस बार यूपी से किसी भी मौजूदा सदस्य को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया।
इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों की केंद्रीय मंत्रिमंडल से छुट्टी तय हो गई है। हालांकि, राज्यसभा में दोबारा लौटने के लिए उन्हें अब किसी अन्य राज्य या बाद में खाली होने वाली सीट का रास्ता तलाशना होगा। कैबिनेट से बाहर होने की संभावना को फिलहाल राजनीतिक अटकल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
सपा ने दो नाम पहले ही घोषित किए
समाजवादी पार्टी ने 30 सितंबर को प्रोफेसर राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाया था। दोनों नामांकन दाखिल कर चुके हैं। धनराज नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज में ग्रुप प्रेसिडेंट हैं और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन से भी जुड़े हैं। राम गोपाल यादव सपा के वरिष्ठ नेता और पार्टी के प्रमुख महासचिव हैं।
फिलहाल भाजपा के 8 और सपा के 2 उम्मीदवार मैदान में हैं। अगर दोनों पार्टियां अतिरिक्त उम्मीदवार नहीं उतारतीं और सभी नामांकन वैध रहते हैं, तो चुनाव निर्विरोध भी हो सकता है। लेकिन सपा की ओर से तीसरे उम्मीदवार की संभावित रणनीति और भाजपा की आठवीं सीट को लेकर मुकाबला अभी राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

37 वोट का गणित, 10वीं सीट पर असली लड़ाई
यूपी विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या फिलहाल करीब 396 बताई जा रही है। 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव में एक उम्मीदवार को जीत के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोट चाहिए।
मौजूदा संख्या के आधार पर भाजपा और उसके सहयोगियों की स्थिति मजबूत है। भाजपा के पास 255 विधायक हैं और उसके प्रमुख NDA सहयोगियों के साथ संख्या 288 तक पहुंचती है। कुछ निर्दलीय और अन्य समर्थक विधायकों को जोड़ने पर NDA का प्रभावी आंकड़ा करीब 294 बताया जा रहा है। आठ उम्मीदवारों को जिताने के लिए 296 प्रथम वरीयता वोट चाहिए।
दूसरी ओर सपा के पास 101 विधायक हैं, हालांकि एक विधायक के भाजपा के साथ जाने के बाद उसका प्रभावी संख्या बल कम माना जा रहा है। कांग्रेस के दो विधायकों के साथ विपक्षी खेमे के पास दो सीटें निकालने के लिए पर्याप्त संख्या है। तीसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त वोटों और क्रॉस वोटिंग की जरूरत पड़ेगी।
चुनाव हुआ तो क्रॉस वोटिंग पर नजर
राज्यसभा चुनाव में विधायक प्रथम वरीयता के आधार पर मतदान करते हैं और चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम से होता है। ऐसे में अगर भाजपा या सपा अतिरिक्त उम्मीदवार उतारती है तो क्रॉस वोटिंग और अतिरिक्त वोटों का गणित निर्णायक हो सकता है।
यही वजह है कि 16 अक्टूबर का चुनाव सिर्फ राज्यसभा की 10 सीटों का मुकाबला नहीं रहेगा। विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले होने के कारण यह भाजपा और सपा दोनों के लिए संगठन, सहयोगियों और विधायकों पर पकड़ का बड़ा टेस्ट भी माना जा रहा है।

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