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रायपुर में सरेंडर नक्सली महिलाओं ने किया रैंप वॉक : कोसा साड़ी में दिखा आत्मविश्वास; बोलीं- हिंसा छोड़ हुनर से बनाएंगे नई पहचान

News Affair Team

Sat, Aug 15, 2026

रायपुर.

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर रायपुर में आयोजित प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन और स्वदेशी एक्सपो में एक अलग तस्वीर देखने को मिली। यहां कभी नक्सल संगठन से जुड़ी रहीं महिलाओं ने कोसा साड़ी पहनकर रैंप वॉक किया। आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा में लौट रही इन महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों के जरिए अपने बदले जीवन की कहानी भी सामने रखी।

रैंप पर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाती महिलाओं ने छत्तीसगढ़ की कोसा सिल्क और हैंडलूम की खूबसूरती दिखाई। इस फैशन शो का मकसद केवल पारंपरिक कपड़ों का प्रदर्शन करना नहीं था, बल्कि यह संदेश देना भी था कि हिंसा का रास्ता छोड़कर सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ नई जिंदगी शुरू की जा सकती है।

पहली बार रायपुर पहुंचीं कई महिलाएं

रैंप वॉक करने वाली लगभग सभी महिलाएं पहली बार रायपुर पहुंची थीं। बड़े मंच पर पारंपरिक परिधान पहनकर रैंप पर चलना उनके लिए नया अनुभव था। शुरुआत में झिझक के बाद जब उन्होंने रैंप संभाला तो चेहरे पर आत्मविश्वास और उत्साह साफ दिखाई दिया।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी आत्मसमर्पित महिलाओं से मुलाकात की। उन्होंने उनसे बातचीत कर उनका उत्साह बढ़ाया और बेहतर भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।

बंदूक की जगह हुनर और हिंसा की जगह आत्मनिर्भरता

इस रैंप वॉक ने बदलते बस्तर की एक अलग तस्वीर पेश की। कभी बंदूक और हिंसा के बीच जीवन बिताने वाली महिलाएं अब कोसा और हथकरघा जैसे पारंपरिक हुनर से जुड़कर नई पहचान बनाने की कोशिश कर रही हैं।

कार्यक्रम के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि पुनर्वास और रोजगार के अवसर मिलने पर आत्मसमर्पित लोग समाज की मुख्यधारा में सम्मान के साथ अपनी जगह बना सकते हैं।

कोसा सिल्क से 'लोकल टू ग्लोबल' तक

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक हथकरघा उत्पादों को देश और दुनिया के बाजार तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया। कोसा सिल्क को राज्य की विशिष्ट पहचान के रूप में आगे बढ़ाने और बुनकरों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में चर्चा हुई।

इसी अवसर पर मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ के प्रीमियम हैंडलूम ब्रांड 'कोशल फैब' का शुभारंभ भी किया।

फैशन शो से मिला नई शुरुआत का संदेश

रैंप पर कोसा साड़ी में उतरी महिलाओं ने एक साथ दो तस्वीरें सामने रखीं। पहली, छत्तीसगढ़ की सदियों पुरानी हथकरघा परंपरा की और दूसरी, बस्तर में बदलाव की।

इन महिलाओं की मौजूदगी ने दिखाया कि मुख्यधारा में वापसी केवल आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं है। शिक्षा, रोजगार, हुनर और सम्मान के अवसर मिलने पर नई जिंदगी की शुरुआत भी संभव है।

रैंप पर कोसा की चमक के साथ एक संदेश भी साफ दिखा—बंदूक छोड़कर हुनर अपनाने वाली महिलाएं अब अपने भविष्य की कहानी खुद लिख रही हैं।

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