पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये का बड़ा डिफेंस पैक्ट : एक पर हमला हुआ तो तीनों साथ लड़ेंगे? ‘मुस्लिम NATO’ की चर्चा तेज
नई दिल्ली.
पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने शुक्रवार को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए हैं। तीनों देशों के बीच हुआ यह समझौता सिर्फ सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है। इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और सुरक्षा मामलों में बेहतर तालमेल बढ़ाने की दिशा में काम करने की बात कही गई है।
इस समझौते की सबसे अहम चर्चा उस कथित सिद्धांत को लेकर है, जिसके मुताबिक एक सदस्य देश पर हमला तीनों पर हमला माना जा सकता है। हालांकि, संकट की स्थिति में बाकी दो देश सैन्य कार्रवाई के लिए बाध्य होंगे या केवल राजनीतिक, खुफिया और हथियारों से मदद करेंगे, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

तीन देशों की अलग-अलग ताकत एक साथ
इस गठजोड़ में तीनों देशों की सैन्य और आर्थिक क्षमताएं अलग-अलग हैं।
पाकिस्तान के पास बड़ी सेना, परमाणु हथियार और युद्ध का लंबा अनुभव है। वह मुस्लिम बहुल देशों में परमाणु हथियार रखने वाला प्रमुख देश है।
सऊदी अरब की सबसे बड़ी ताकत उसकी आर्थिक क्षमता है। इससे वह रक्षा सहयोग, हथियारों की खरीद और सैन्य परियोजनाओं में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
वहीं तुर्किये NATO का सदस्य है और ड्रोन तकनीक तथा रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा चुका है।
अमेरिका पर निर्भरता कम करने की कोशिश?
यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया में अमेरिका की भूमिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा रणनीति पर बहस चल रही है। लंबे समय से सऊदी अरब समेत कई देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर काफी निर्भर रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘बर्डन शेयरिंग’ वाली नीति के बाद सहयोगी देशों को अपनी सुरक्षा क्षमता बढ़ाने पर ज्यादा जोर देना पड़ रहा है। क्षेत्र में इजराइल की भूमिका और ईरान से बढ़ते तनाव ने भी अरब देशों को अपने सुरक्षा विकल्पों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है।

तीनों देशों के सामने अलग-अलग सुरक्षा चुनौतियां
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये अपने-अपने स्तर पर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
पाकिस्तान की अफगानिस्तान के साथ सीमा पर तनाव की स्थिति बनी हुई है। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच भी सैन्य तनाव देखने को मिला था।
सऊदी अरब को यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों से जुड़े सुरक्षा खतरे का सामना करना पड़ा है। वहीं तुर्किये लंबे समय से कुर्द हथियारबंद संगठनों के खिलाफ अभियान चला रहा है। इजराइल के साथ उसके संबंध भी तनावपूर्ण रहे हैं।
ऐसे माहौल में तीनों देशों का सैन्य सहयोग बढ़ाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल- हमला हुआ तो क्या सेना भेजेंगे?
इस समझौते की वास्तविक ताकत संकट के समय ही सामने आएगी। अगर तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो क्या बाकी दोनों देश सीधे सैन्य कार्रवाई करेंगे? या फिर वे हथियार, खुफिया जानकारी, आर्थिक सहायता और राजनीतिक समर्थन तक सीमित रहेंगे? यही सवाल इस रक्षा समझौते को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में है।
किलोवेन ग्रुप एडवाइजरी फर्म के चेयरमैन हार्लन उलमैन के मुताबिक, यह मान लेना कि एक देश पर हमला सभी पर हमला होगा और वास्तव में ऐसा होना, दोनों अलग बातें हैं। इसलिए समझौते के वास्तविक सैन्य दायित्वों को लेकर अभी कई चीजें स्पष्ट होना बाकी हैं।
क्या बन रहा है ‘मुस्लिम NATO’?
तीनों देशों के बीच समझौते के बाद इसे ‘मुस्लिम NATO’ की दिशा में कदम बताए जाने की चर्चा शुरू हो गई है। वजह यह है कि सामूहिक सुरक्षा, सैन्य सहयोग और रक्षा क्षमताओं को साथ लाने का मॉडल NATO से कुछ हद तक मिलता-जुलता दिखाई देता है।
भविष्य में अगर दूसरे मुस्लिम देश भी इससे जुड़ते हैं तो इसका दायरा काफी बढ़ सकता है। मिस्र, कतर, UAE और अन्य देशों की संभावित भागीदारी इसे एक बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा मंच में बदल सकती है।
हालांकि, फिलहाल इसे NATO का विकल्प कहना जल्दबाजी होगी। NATO की तरह मजबूत सामूहिक रक्षा व्यवस्था के लिए स्पष्ट सैन्य प्रतिबद्धता, संयुक्त कमान, स्थायी ढांचा और व्यापक सदस्यता जरूरी होगी।
सुन्नी देशों के बीच बढ़ रहा सुरक्षा सहयोग
पश्चिम एशिया के कई सुन्नी बहुल देश लंबे समय से अलग-अलग सुरक्षा समीकरणों में रहे हैं। इजराइल-ईरान तनाव, क्षेत्रीय संघर्ष और अमेरिका की बदलती भूमिका के बीच अब क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा व्यवस्था को ज्यादा आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दे रहे हैं।
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये का यह समझौता इसी बदलते सुरक्षा समीकरण का संकेत माना जा रहा है। आने वाले समय में यह गठजोड़ कितना मजबूत होता है और इसमें कितने देश शामिल होते हैं, इसी से तय होगा कि ‘मुस्लिम NATO’ की चर्चा वास्तविक क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन में बदलती है या नहीं।
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