'संविधान नहीं, सत्ता के प्रति वफादारी दिखती है' : इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी पुलिस पर सख्त टिप्पणी; गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई रद्द
News Affair Team
Sun, Jun 7, 2026
प्रयागराज.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि प्रदेश में तबादला, पोस्टिंग और पदोन्नति की प्रक्रिया लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित रही है। अदालत ने कहा कि इसका असर पुलिस अधिकारियों के फैसलों और उनके कामकाज पर साफ दिखाई देता है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने कहा,
कई मामलों में अधिकारियों की प्राथमिकता संविधान और कानून के प्रति जवाबदेही से अधिक सत्ता प्रतिष्ठान को संतुष्ट करने की दिखाई देती है।
अदालत ने यह टिप्पणी गाजियाबाद के एक जमीन विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।
कोर्ट बोला- राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित होती है कार्यप्रणाली
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
फील्ड में कार्यरत अधिकारी ट्रांसफर-पोस्टिंग की व्यवस्था को भलीभांति समझते हैं और कई बार उनका आचरण भी उसी के अनुरूप बदल जाता है।
अदालत ने कहा कि जब नियुक्तियां और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां योग्यता के बजाय अन्य कारणों से तय होने लगती हैं तो निष्पक्ष प्रशासन प्रभावित होता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का उपयोग तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति या समूह को निशाना बनाने के लिए।
जमीन विवाद से शुरू हुआ मामला
मामला गाजियाबाद निवासी राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार से जुड़ा है। उनके खिलाफ जमीन विवाद को लेकर धोखाधड़ी, जालसाजी और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। बाद में पुलिस ने इस प्रकरण में गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई शुरू कर दी।
पुलिस का दावा था कि आरोपी संगठित गिरोह की तरह काम कर रहे थे। इसी आधार पर गैंग चार्ट तैयार किया गया और परिवार के कई सदस्यों को आरोपी बनाया गया। इनमें ललिता त्यागी का नाम भी शामिल था, जिन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।
80 दिन जेल में रहीं महिला, फिर पहुंचीं हाईकोर्ट
ललिता त्यागी करीब 80 दिन तक जेल में रहीं। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई को चुनौती दी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे रिकॉर्ड और जांच दस्तावेजों की समीक्षा की।
कोर्ट को ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि ललिता त्यागी किसी संगठित आपराधिक गिरोह का हिस्सा थीं या उन्होंने भय पैदा कर आर्थिक लाभ हासिल किया था।
गैंगस्टर एक्ट लगाने पर कोर्ट ने उठाए सवाल
अदालत ने कहा कि किसी सामान्य जमीन विवाद को गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर कानून के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त और ठोस आधार होना आवश्यक है। केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को गैंगस्टर घोषित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों और वरिष्ठ अधिकारियों को अधिक सतर्कता और स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।
तत्कालीन पुलिस कमिश्नर की भूमिका पर टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना नहीं, बल्कि तथ्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन करना भी है।
अदालत ने तत्कालीन गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर अजय मिश्रा को भविष्य में अधिक जिम्मेदारी और संतुलन के साथ निर्णय लेने की सलाह दी।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कठोर कानूनों के इस्तेमाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों द्वारा तय मानकों का पालन अनिवार्य है। बिना पर्याप्त जांच और साक्ष्यों के किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं की जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी, मुकदमा दर्ज करने और विशेष कानून लगाने जैसी कार्रवाइयों में संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
पूरी कार्रवाई रद्द, प्रशासन को दी नसीहत
हाईकोर्ट ने अंततः राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया। साथ ही कहा कि पुलिस और प्रशासन की पहली जिम्मेदारी संविधान और कानून के प्रति है।
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