भारतीय तमिल मूल की नवी पिल्लै को शांति का नोबेल : रंगभेद के दौर में नौकरी नहीं मिली तो खोली लॉ फर्म; रवांडा नरसंहार के दोषियों को दिलाई सजा
ओस्लो.
रंगभेद के दौर में दक्षिण अफ्रीका में एक भारतीय मूल की महिला को नस्ल के आधार पर कोई लॉ फर्म नौकरी देने को तैयार नहीं थी। उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी लॉ फर्म खोल ली। यही महिला आगे चलकर दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट की पहली गैर-श्वेत महिला जज बनीं और रवांडा नरसंहार से जुड़े मुकदमों में ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहीं। अब 85 वर्षीय नवनीतम ‘नवी’ पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान हुआ है।
नॉर्वे की नोबेल समिति ने 9 अक्टूबर को पिल्लै को यह सम्मान देने की घोषणा की। उन्हें युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार के दोषियों को जवाबदेह ठहराने तथा अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के प्रयासों के लिए चुना गया है।

पुरस्कार की घोषणा के बाद पिल्लै ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर भी हल्के-फुल्के अंदाज में तंज कसा। उनके साथियों ने जब पुरस्कार मिलने पर तालियां बजाईं, तो उन्होंने मजाक में कहा कि अगर वे थोड़ी और तालियां बजाएंगे, तो शायद वह पुरस्कार ट्रम्प के साथ बांट लें।

नोबेल समिति का संदेश- ताकतवर देश भी कानून से ऊपर नहीं
नोबेल समिति के अध्यक्ष योर्गेन वाट्ने फ्राइडनेस ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून शांति बनाए रखने और विवादों को हिंसा के बजाय कानूनी तरीके से सुलझाने के लिए जरूरी है। समिति के मुताबिक, पिल्लै का लंबा करियर इस बात का उदाहरण है कि युद्ध अपराध और नरसंहार जैसे गंभीर मामलों में भी दोषियों को जवाबदेह ठहराना संभव है।
इस बार समिति पिल्लै से पुरस्कार की घोषणा से पहले संपर्क नहीं कर पाई थी। घोषणा के बाद फ्राइडनेस ने मजाकिया अंदाज में कहा कि नॉर्वे के अंतरराष्ट्रीय कोड +47 से फोन आए, तो उसे उठा लेना चाहिए।
दादा मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका पहुंचे, परिवार ने देखे भेदभाव के दिन
नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ था। उनके दादा 1890 के दशक में भारत से बंधुआ मजदूर के रूप में दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहां भारतीय मूल के परिवारों को नस्लीय भेदभाव और सामाजिक असमानता का सामना करना पड़ता था।
पिल्लै ने यूनिवर्सिटी ऑफ नेटाल से पढ़ाई की और कानून की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1967 में उन्होंने अपनी लॉ फर्म शुरू की। रंगभेद के माहौल में किसी दूसरी फर्म में नौकरी न मिलने के बावजूद उन्होंने वकालत जारी रखी और कानूनी अधिकारों के लिए काम किया।
मंडेला समेत राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए उठाई आवाज
1973 में पिल्लै ने ऐसी कानूनी पहल की, जिसके बाद रॉबेन आइलैंड जेल में बंद राजनीतिक कैदियों को वकीलों की मदद लेने का अधिकार मिला। इनमें नेल्सन मंडेला भी शामिल थे। यह दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष के दौरान राजनीतिक बंदियों के अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
1995 में मंडेला के राष्ट्रपति रहते हुए पिल्लै को दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया गया। वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनीं। इसके बाद उनका करियर राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय अदालतों तक पहुंचा।
रवांडा नरसंहार के मुकदमों में निभाई अहम भूमिका
1994 में रवांडा में तुत्सी समुदाय के लोगों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था। इस अपराध की सुनवाई के लिए संयुक्त राष्ट्र ने इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल फॉर रवांडा (ICTR) बनाया। पिल्लै 1995 में इस ट्रिब्यूनल की जज नियुक्त हुईं और बाद में इसकी अध्यक्ष भी बनीं।
यहां उनके काम ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून को नई दिशा देने में योगदान दिया। नरसंहार के दौरान यौन हिंसा और मीडिया के जरिए नफरत फैलाने की भूमिका जैसे मुद्दे भी अदालत के सामने आए।

दो ऐतिहासिक फैसले, जिनका असर अंतरराष्ट्रीय कानून पर पड़ा
1. यौन हिंसा को नरसंहार के अपराध से जोड़ा
1998 में रवांडा के ताबा शहर के मेयर जीन-पॉल अकायेसू को नरसंहार और अन्य अपराधों में दोषी ठहराया गया। पिल्लै इस मामले की सुनवाई करने वाले तीन जजों में शामिल थीं।
फैसले में स्पष्ट किया गया कि यदि किसी समुदाय को पूरी तरह या उसके किसी हिस्से को नष्ट करने के इरादे से यौन हिंसा की जाती है, तो परिस्थितियों के आधार पर उसे नरसंहार के अपराध का हिस्सा माना जा सकता है। यह फैसला इसलिए अहम था, क्योंकि युद्ध और सामूहिक हिंसा के दौरान महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों को अक्सर पर्याप्त कानूनी महत्व नहीं मिलता था।
2. नफरत फैलाने वाले मीडिया को भी जवाबदेह ठहराया
रवांडा नरसंहार के दौरान रेडियो और अखबारों के जरिए नफरत फैलाने तथा लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के मामलों में भी ट्रिब्यूनल ने ऐतिहासिक कार्रवाई की। 2003 में मीडिया से जुड़े फर्डिनेंड नाहिमाना, जीन-बोस्को बारायाग्विजा और हसन नगेजे को नरसंहार तथा उससे जुड़े अपराधों में दोषी ठहराया गया।
इन मामलों ने यह स्थापित करने में मदद की कि मीडिया के जरिए हिंसा भड़काने वाले लोग भी अपने कृत्यों के लिए कानूनी रूप से जवाबदेह हो सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों की अगुवाई भी की
पिल्लै 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं। इस भूमिका में उन्होंने मानवाधिकारों की रक्षा, भेदभाव के खिलाफ कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन से जुड़े मुद्दों पर काम किया। वह अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था से जुड़े मामलों में भी सक्रिय रहीं।
नोबेल समिति ने उनके पूरे करियर को अंतरराष्ट्रीय कानून और जवाबदेही को मजबूत करने के प्रयासों के रूप में देखा है।
भारतीय मूल की छठी हस्ती होने का दावा कितना सही?
नवी पिल्लै का परिवार भारतीय तमिल मूल का है, लेकिन उनकी राष्ट्रीयता दक्षिण अफ्रीकी है। उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बाद भारतीय मूल की नोबेल सम्मानित हस्तियों की सूची में उनका नाम भी जोड़ा जा रहा है। इस सूची में हरगोविंद खुराना, सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर, वी. एस. नायपॉल, वेंकी रामकृष्णन और अभिजीत बनर्जी जैसे नाम शामिल किए जाते हैं।
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