OBC क्रीमीलेयर पर फैसले से IAS की ट्रेनिंग अटकी : 958 अफसरों का सर्विस अलॉटमेंट रुका; 14 साल की भर्तियों पर असर पड़ने की आशंका
नई दिल्ली.
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बाद प्रशासनिक सेवा में जाने का इंतजार कर रहे 958 अभ्यर्थियों की ट्रेनिंग पर कानूनी पेच फंस गया है। सुप्रीम कोर्ट के OBC क्रीमीलेयर पर 11 मार्च को दिए फैसले के बाद केंद्र सरकार ने इसके लागू होने के तरीके पर स्पष्टीकरण मांगा है। मामला पुरानी भर्तियों तक पहुंचा तो पहले से नियुक्त अधिकारियों की वरिष्ठता, कैडर और सेवा आवंटन पर भी असर पड़ सकता है।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने रविवार को जारी नोट में कहा कि सरकार अदालत के निर्देशों का इंतजार कर रही है। विभाग ने पिछले 14 वर्षों की सिविल सेवा परीक्षाओं के आंकड़ों और संभावित प्रभावों का आकलन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर को केंद्र की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। तब से नए चयनित अभ्यर्थियों का सेवा आवंटन और फाउंडेशन कोर्स शुरू होने का इंतजार बना हुआ है।
11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने OBC क्रीमीलेयर तय करने से जुड़े मामलों में केंद्र की अपील खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा-
क्रीमीलेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की सैलरी या आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके पद, सामाजिक स्थिति और लागू नियमों को भी ध्यान में रखना होगा।
मामले में उन अभ्यर्थियों ने राहत मांगी थी, जिन्हें सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद OBC नॉन-क्रीमीलेयर का लाभ नहीं दिया गया था। उनके माता-पिता की सैलरी को आधार बनाकर उन्हें क्रीमीलेयर में रखा गया था। विवाद यह भी था कि सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों या निजी क्षेत्र में काम करने वाले अभिभावकों की आय को लेकर अलग-अलग मानदंड अपनाए जा रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरक्षण के लिए क्रीमीलेयर तय करने की प्रक्रिया में इस तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। फैसले में संबंधित अभ्यर्थियों के मामलों में नियमों के अनुसार दोबारा विचार करने और जरूरी कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए।
केंद्र ने फैसले को लेकर दोबारा सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों किया?
केंद्र सरकार की चिंता है कि फैसले को पिछली भर्तियों पर भी लागू किया गया तो पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं पर सवाल उठ सकते हैं। इसी वजह से सरकार ने 24 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में स्पष्टीकरण के लिए याचिका दाखिल की थी।
सरकार ने अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि फैसले का असर पहले से हो चुकी नियुक्तियों, सेवा आवंटन, वरिष्ठता और दाखिलों पर किस तरह पड़ेगा। केंद्र ने फैसले को भविष्य में लागू करने और व्यवस्था तैयार करने के लिए समय देने का अनुरोध भी किया है। 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया। अब आगे की प्रक्रिया अदालत के आदेश पर निर्भर है।
पुरानी भर्तियां खुलीं तो क्या बदल सकता है?
अगर फैसले का असर पिछली चयन प्रक्रियाओं तक पहुंचता है, तो ऐसे OBC अभ्यर्थी फिर से अपनी पात्रता की समीक्षा की मांग कर सकते हैं, जिन्हें माता-पिता की सैलरी के आधार पर क्रीमीलेयर मानकर आरक्षण से बाहर रखा गया था।
इससे केवल IAS या IPS जैसी सेवाओं का मामला नहीं रहेगा। सेवा और कैडर आवंटन में बदलाव की मांग उठ सकती है। पहले से नियुक्त अधिकारियों की वरिष्ठता और सेवा शर्तों पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। हालांकि, यह असर स्वतः लागू नहीं होगा; इसकी सीमा सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण और संबंधित नियमों के आधार पर तय होगी।
DoPT के आकलन में UPSC के अलावा SSC, रेलवे भर्ती बोर्ड और बैंक भर्ती जैसी प्रक्रियाओं पर भी संभावित असर शामिल है। उच्च शिक्षण संस्थानों में पहले हुए दाखिलों को लेकर भी पात्रता की समीक्षा की मांग उठने की आशंका जताई गई है।

क्या है OBC क्रीमीलेयर का नियम?
OBC वर्ग के सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न तबके को क्रीमीलेयर कहा जाता है। ऐसे अभ्यर्थियों को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का फायदा उन पिछड़े वर्गों तक पहुंचे जिन्हें इसकी जरूरत है।
क्रीमीलेयर का सिद्धांत 1992 के इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लागू हुआ। केंद्र सरकार के नियमों में आय के साथ-साथ माता-पिता के पद और सेवा की श्रेणी जैसे मानदंड भी शामिल हैं।
महत्वपूर्ण बात: OBC क्रीमीलेयर की पात्रता केवल एक आय-सीमा देखकर तय नहीं की जाती। अभिभावकों की नौकरी, पद और लागू सरकारी दिशा-निर्देश भी मायने रखते हैं। इसलिए किसी अभ्यर्थी की पात्रता का फैसला उसके मामले और संबंधित नियमों के आधार पर ही किया जा सकता है।
अब 958 अभ्यर्थियों को किस बात का इंतजार?
सिविल सेवा परीक्षा 2025 के नतीजे 6 मार्च को घोषित हुए थे, जबकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला 11 मार्च को आया। सेवा आवंटन पूरा होने से पहले आए इस फैसले ने प्रक्रिया को उलझा दिया। नतीजतन 958 चयनित अभ्यर्थियों का फाउंडेशन कोर्स निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो पाया।
DoPT का कहना है कि विभाग और प्रशिक्षण संस्थान सेवा आवंटन और ट्रेनिंग शुरू करने के लिए तैयार हैं। लेकिन फिलहाल अदालत से निर्देश मिलने का इंतजार है। इस मामले में अगला आदेश न केवल नए चयनित अभ्यर्थियों की ट्रेनिंग का रास्ता साफ कर सकता है, बल्कि यह भी तय करने में अहम होगा कि फैसले का दायरा पुरानी भर्तियों तक कितना जाएगा।

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