शिवाजी बनाम टीपू सुल्तान : महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष के बयान से बवाल; BJP बोली- पागल हो गए
News Affair Team
Sun, Feb 15, 2026
मुंबई.
महाराष्ट्र की राजनीति में इतिहास फिर से ‘हॉट टॉपिक’ बन गया है। महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल के एक बयान ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया कि सत्ता से लेकर सड़क तक बयानबाज़ी तेज हो गई।
मामला छत्रपति शिवाजी महाराज और टीपू सुल्तान की तुलना का है। सपकाल ने कहा कि टीपू सुल्तान को शिवाजी महाराज के बराबर मानना चाहिए। उनके मुताबिक टीपू एक बहादुर योद्धा थे और भारत के भूमिपुत्र के रूप में उभरे। उन्होंने यह भी कहा कि टीपू ने कभी जहरीली सोच को नहीं अपनाया।
बस, यहीं से सियासी पारा चढ़ गया।

बयान की पृष्ठभूमि क्या थी?
14 फरवरी को बुलढाणा में मालेगांव नगर निगम के डिप्टी मेयर निहाल अहमद के दफ्तर से टीपू सुल्तान की तस्वीर हटाने पर विवाद हुआ था। उसी संदर्भ में सपकाल से सवाल पूछा गया था।
बाद में उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की बहादुरी बेमिसाल है, जबकि टीपू सुल्तान भी बहादुर और स्वराज्य के प्रेमी थे। उनका दावा था कि टीपू ने शिवाजी महाराज को आदर्श मानकर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी।
लेकिन राजनीतिक बयान अक्सर संदर्भ से बाहर निकलकर अलग ही रूप ले लेते हैं। यही हुआ।

BJP का पलटवार: “शर्मनाक बयान”
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बयान को शर्मनाक बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता को खुद पर शर्म आनी चाहिए।
पुणे में BJP कार्यकर्ताओं ने सपकाल के खिलाफ प्रदर्शन किया, पोस्टर जलाए और मामला दर्ज भी कराया गया।
BJP प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष का “दिमाग खराब हो गया है” और उन्हें तुरंत माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी और सोनिया गांधी से कार्रवाई की मांग भी कर डाली।

सपकाल की सफाई: “बयान तोड़-मरोड़कर पेश किया गया”
विवाद बढ़ा तो हर्षवर्धन सपकाल ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनका बयान सवाल के संदर्भ में था और उसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
उन्होंने साफ कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। वे चर्चा के लिए तैयार हैं और अपने बयान पर बहस से नहीं भागेंगे।
इतिहास की टाइमलाइन: कौन पहले, कौन बाद में?
अब जरा इतिहास की बात।
छत्रपति शिवाजी महाराज
छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 1627 में हुआ। उन्होंने मुगलों और दक्खन की सल्तनतों से संघर्ष कर मराठा साम्राज्य की नींव रखी। 1675 में उनका राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने ‘हिंदव धर्मोद्धारक’ की उपाधि धारण की। 1680 में उनका निधन हो गया।
टीपू सुल्तान
टीपू सुल्तान का जन्म 1751 में हुआ, यानी शिवाजी के करीब सवा सौ साल बाद। 1782 में पिता हैदर अली की मृत्यु के बाद वे मैसूर की गद्दी पर बैठे। 1799 में चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध में अंग्रेजों से लड़ते हुए उनकी मृत्यु हुई।
टीपू सुल्तान ने फ्रांसीसियों के साथ गठजोड़ किया था और 1798 में नेपोलियन से पत्राचार भी किया था, ताकि अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा मजबूत किया जा सके।
राजनीति में इतिहास क्यों ‘ट्रिगर’ बनता है?
महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज सिर्फ ऐतिहासिक शख्सियत नहीं, बल्कि अस्मिता और गौरव का प्रतीक हैं। ऐसे में उनकी तुलना किसी अन्य शासक से करना राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा बन जाता है।
दूसरी तरफ टीपू सुल्तान को लेकर देश में अलग-अलग मत रहे हैं—कुछ उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का शुरुआती योद्धा मानते हैं, तो कुछ उनकी नीतियों पर सवाल उठाते हैं।
सवाल यही है—क्या इतिहास की बहस अकादमिक दायरे में रह पाएगी, या हर बार राजनीतिक अखाड़े में उतरती रहेगी?
फिलहाल महाराष्ट्र में इस बयान ने नई बहस छेड़ दी है। आगे देखना होगा कि यह विवाद सिर्फ बयानबाज़ी तक रहता है या चुनावी मुद्दा भी बनता है।
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